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बिहार में शराबबंदी पर सियासी संग्राम तेज, NDA सहयोगियों की मांग पर JDU का सख्त रुख
- Reporter 12
- 21 Apr, 2026
बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर एनडीए सहयोगी दलों और नेताओं की मांग के बीच जेडीयू ने साफ कर दिया है कि इस कानून में किसी तरह का बदलाव या समझौता नहीं किया जाएगा।
पटना/आलम की खबर:बिहार में शराबबंदी कानून एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। राज्य में नई सरकार बनने के बाद जहां इस कानून की समीक्षा को लेकर अटकलें तेज थीं, वहीं अब यह मुद्दा सत्ता पक्ष के भीतर ही मतभेद का कारण बनता दिख रहा है। एनडीए के कई सहयोगी दल और कुछ विधायक लगातार इस कानून में बदलाव या समाप्ति की मांग उठा रहे हैं, लेकिन सत्तारूढ़ Janata Dal (United) ने इस पर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। पार्टी ने साफ शब्दों में कहा है कि शराबबंदी कानून में किसी भी तरह की छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जाएगी और यह नीति पहले की तरह ही सख्ती से लागू रहेगी। इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में हलचल और तेज हो गई है।
सहयोगी दलों की बढ़ती मांग
बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर सबसे ज्यादा आवाज एनडीए के सहयोगी दलों की तरफ से उठाई जा रही है। Jitan Ram Manjhi की पार्टी से लेकर Upendra Kushwaha के नेतृत्व वाले राजनीतिक समूह तक, कई नेताओं ने इस कानून की समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया है।
इन नेताओं का तर्क है कि शराबबंदी के मौजूदा स्वरूप में कई व्यावहारिक समस्याएं सामने आ रही हैं, जिनका समाधान जरूरी है। कुछ का मानना है कि इस कानून के कारण आम लोगों, खासकर गरीब वर्ग, को कानूनी प्रक्रियाओं में उलझना पड़ रहा है, जबकि असली अपराधी बच निकलते हैं। यही कारण है कि वे सरकार से इस नीति पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे हैं।
अनंत सिंह का खुला विरोध
इस पूरे विवाद में मोकामा से विधायक Anant Singh का रुख सबसे ज्यादा मुखर रहा है। उन्होंने लगातार यह कहा है कि शराबबंदी कानून से राज्य को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा, बल्कि इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।
उनका दावा है कि शराबबंदी के बावजूद अवैध नशे का चलन बढ़ा है और युवा वर्ग गलत दिशा में जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि छोटे-छोटे बच्चे भी नशे की चपेट में आ रहे हैं, जो एक गंभीर सामाजिक समस्या है। इस तरह के बयानों ने इस मुद्दे को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
जेडीयू का सख्त रुख
इन सभी मांगों के बीच Janata Dal (United) ने स्पष्ट कर दिया है कि शराबबंदी कानून को लेकर किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। पार्टी के प्रवक्ता Neeraj Kumar ने कहा कि यह केवल एक सरकारी नीति नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि जब देश के प्रधानमंत्री Narendra Modi और राज्य के वरिष्ठ नेता Nitish Kumar इस कानून के पक्ष में हैं, तो इसमें बदलाव का सवाल ही नहीं उठता। उनके अनुसार, शराबबंदी को एक सामाजिक आंदोलन के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसे कमजोर करना सही नहीं होगा।
सरकार की नीति और नेतृत्व का संदेश
राज्य के वर्तमान नेतृत्व की ओर से भी यह स्पष्ट संकेत दिया गया है कि सरकार इस मुद्दे पर अपने पुराने रुख से पीछे नहीं हटेगी। मुख्यमंत्री Samrat Choudhary ने भी पहले ही कह दिया है कि बिहार की नीतियां उसी मॉडल पर चलेंगी, जो पहले तय किया गया था।
इसका मतलब यह है कि शराबबंदी कानून को लेकर कोई नरमी नहीं बरती जाएगी और इसे सख्ती से लागू किया जाएगा। सरकार का यह रुख उन अटकलों को भी खत्म करता है, जिनमें कहा जा रहा था कि नई सरकार इस कानून में बदलाव कर सकती है।
सामाजिक बनाम राजनीतिक बहस
शराबबंदी का मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। एक ओर जहां इसे महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों के हित में उठाया गया कदम बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर इसके क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस अब दो स्तरों पर चल रही है—एक, कानून के उद्देश्य को लेकर और दूसरा, उसके प्रभाव और परिणाम को लेकर। यही कारण है कि यह मुद्दा चुनावी राजनीति में भी बार-बार उभरकर सामने आता है।
एनडीए के भीतर मतभेद के संकेत
इस पूरे विवाद से यह भी साफ हो रहा है कि एनडीए के भीतर इस मुद्दे को लेकर एकराय नहीं है। जहां सहयोगी दल और कुछ नेता बदलाव की मांग कर रहे हैं, वहीं जेडीयू अपने रुख पर अडिग है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह मतभेद लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर गठबंधन की एकजुटता पर भी पड़ सकता है। हालांकि, फिलहाल सभी दल सार्वजनिक रूप से सरकार के साथ बने रहने की बात कह रहे हैं।
आगे क्या होगा
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह बहस केवल बयानबाजी तक सीमित रहेगी या भविष्य में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा। फिलहाल सरकार का रुख साफ है कि शराबबंदी कानून में कोई बदलाव नहीं होगा, लेकिन सहयोगी दलों का दबाव भी लगातार बना हुआ है।
ऐसे में आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अपने फैसले पर कितनी मजबूती से कायम रहती है और क्या इस मुद्दे पर कोई नया रास्ता निकलता है।
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